adsterraCross

Wednesday, 13 December 2017

गाड़िया लोहारों के घुम्मकड़ जीवन जीने के पीछे का राज़

दोस्तों जैसा की  जानते ही हैं की गाड़िया लोहार जनजाति हमेशा से घुम्मकड़ जीवन व्यतीत करते आई हैं | लेकिन दोस्तों क्या आप जानते की वो यह घुमक्कड़ जीवन क्यों जीते हैं ? आज में आपको इसके पीछे का राज़  बताऊंगा |




दोस्तों जैसा की सभी को पता हैं की हल्दी घाटी का भयंकर युद्ध गर्वीले महाराणा प्रताप और अकबर के बीच 18 जून 1576 ईस्वी को था | इस युद्ध में महाराणा का साथ हाकिम खां सूरी और भीलों के एक छोटे से दस्ते ने भी दिया था | युद्ध में पराजित होने के बाद चित्तौड़ का अधिकांश भाग मुगलों के अधीन हो गया था | युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप ने आदिवासी भीलों के सहयोग से गोगुन्दा की पहाड़ियों में रहकर छापामार युद्ध  जारी रखा |




तभी इन गाड़िया लोहारों ने प्रण किया था की जब तक चित्तौड़ को पुनः प्राप्त नहीं कर लेंगे घास फुश की रोटी खाएंगे और खुले आसमान के नीचे जीवन व्यतीत करेंगे | और उसी स्वामिभक्ति के कारण गाड़िया लोहार आज भी खुले आसमानों के नीचे घुम्मकड़ जीवन जीते हैं |